नई दिल्ली: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पश्चिम बंगाल में अवैध कोयला खनन और तस्करी के बड़े सिंडिकेट पर अपना शिकंजा और कस लिया है। केंद्रीय जांच एजेंसी ने बुधवार को घोषणा की कि उसने इस मामले में ₹159.51 करोड़ की संपत्ति को अस्थायी रूप से ज़ब्त (अटैच) किया है।
यह पूरी कार्रवाई अनूप माझी, जिसे 'लाला' के नाम से जाना जाता है, के नेतृत्व वाले आपराधिक गिरोह के खिलाफ की गई है। इस ताज़ा कार्रवाई के साथ ही इस हाई-प्रोफाइल मामले में अब तक ज़ब्त की गई कुल संपत्ति का मूल्य ₹482.22 करोड़ तक पहुँच गया है।
जाँच के दौरान ईडी ने एक बेहद पेचीदा नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। इसमें नकली टैक्स इनवॉइस, व्हाट्सएप आधारित रिश्वतखोरी प्रणाली और राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्मों के साथ-साथ औद्योगिक समूहों के माध्यम से धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) के गंभीर सबूत मिले हैं।
जांच में सामने आया कि अनूप माझी का गिरोह अवैध खनन के माध्यम से निकाले गए कोयले को पश्चिम बंगाल की कई लाभार्थी कंपनियों को नकद में बेचता था। ये कंपनियाँ जान-बूझकर इस अवैध कोयले की खरीद करती थीं, जिससे अपराध से हुई कमाई को वैध दिखाने और उसे छिपाने में मदद मिलती थी।
ज़ब्त की गई संपत्तियों में कॉर्पोरेट बॉन्ड और वैकल्पिक निवेश फंड जैसे वित्तीय साधन शामिल हैं। ये निवेश श्याम सेल एंड पावर लिमिटेड और श्याम फेरो अलॉयज लिमिटेड जैसी संस्थाओं के नाम पर थे, जो श्याम समूह का हिस्सा हैं। इस समूह का प्रबंधन और नियंत्रण मुख्य रूप से संजय अग्रवाल और बृज भूषण अग्रवाल द्वारा किया जाता है। ईडी की जाँच में यह भी पाया गया कि यह गिरोह स्थानीय पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से कोयला चोरी का बड़ा साम्राज्य चला रहा था।
इस सिंडिकेट के काम करने का तरीका (Modus Operandi) काफी चौंकाने वाला था। गिरोह 'लाला पैड' नामक एक फर्जी परिवहन चालान प्रणाली का उपयोग करता था। ये चालान उन कंपनियों के नाम पर जारी किए जाते थे, जिनका धरातल पर कोई अस्तित्व नहीं था।
ट्रांसपोर्टर को कोयले के ट्रक के साथ ₹10 या ₹20 का एक विशिष्ट नोट दिया जाता था। चालक उस नोट को ट्रक की नंबर प्लेट के पास रखकर फोटो खींचता था और उसे व्हाट्सएप के जरिए गिरोह के ऑपरेटर को भेज देता था। यही फोटो आगे पुलिस अधिकारियों को भेजी जाती थी ताकि अवैध कोयले से लदे वाहनों को बिना किसी बाधा के निकलने दिया जाए।
इसके अलावा, गिरोह बैंकिंग चैनलों से बचने के लिए 'हवाला नेटवर्क' का सहारा लेता था। लेनदेन को प्रमाणित करने के लिए करेंसी नोट के सीरियल नंबर का उपयोग यूनिक कोड के रूप में किया जाता था। फिलहाल, ईडी इस सिंडिकेट के अन्य राजनीतिक और प्रशासनिक संबंधों की गहराई से जांच कर रही है।